दिल्ली में बस्तियों को गिराने का आदेश और मज़दूरों के आवास का प्रश्न

देश कोरोना और आर्थिक संकट से गुज़र रहा है जिनका सबसे ज्यादा असर ग़रीबों पर हुआ है, और इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच ने दिल्ली में रेलवे लाइनों के आस पास बसी करीब 48000 झुग्गियों को तोड़ने का आदेश दे दिया है।

कोर्ट ने संबंधित सरकारी विभाग को आदेश दिया है कि तीन महीने की समय सीमा के भीतर, सभी झुग्गी झोपड़ियां तोड़ दी जाएँ, और इसी आदेश में यह भी कहा गया है कि इस के विरोध में किसी भी तरीके की राजनीतिक दखल नहीं दी जा सकती।

इस फैसले से करीब 2 से 3 लाख लोगों के बेघर होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इन लोगों का क्या होगा, इस पर कोर्ट ने कोई भी बात नहीं की। मीडिया के लिये भी यह बात बहुत मायने नहीं रखती, क्योंकि आज वह सस्ते मनोरंजन और कानाफूसी का साधन बन गई है। असली मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाना उसका मुख्य पेशा हो गया है।

वैसे भी देश के उच्च और मध्यम वर्गों की नज़र में चुँकि झुग्गी बस्तियाँ और वहां के लोग शहरों की आनबान को चोट पहुँचाते हैं, इन बस्तियों का जल्द से जल्द खत्म होना निहायत ज़रूरी है। झुग्गियों में रहने वाले लोग संभ्रांतों के लिये अमूमन अदृश्य रहते हैं, जब तक कि वहाँ से आए उनके कोठियों पर काम करने वाले मज़दूरों और मज़दूरनियों से पाला नहीं पड़ता।

इन झुग्गी झोपड़ियों को न केवल शहर पर बदनुमा दाग की तरह पेश किया जाता है, बल्कि उन्हें ज़बरदस्ती अतिक्रमणकारियों और असामाजिक तत्वों के गढ़ के रूप में भी प्रचारित किया जाता रहा है। ये “गंदी” बस्तियां जहाँ मज़दूर रहते हैं, वो महामारी के उद्गम स्थल हैं — बीमारियां उन गंदी बस्तियों से हो कर शहर के तथाकथित संभ्रांत स्वच्छ इलाकों में फैल जाती है। मौत की देवी ने अमीरों और गरीबों में अभी तक फर्क करना नहीं सीखा है। इसलिये भी भावुक और भलमनसाहत से ग्रस्त लोग उन जगहों को उजाड़ कर उनके बाशिन्दों को दूर बसा देना चाहते हैं।

उन गंदी बस्तियों में रहने वाले अधिकतर लोग न तो अपनी मर्ज़ी से रहते हैं न ही वे लोग गैर कानूनी धंधों में लिप्त रहते हैं, बल्कि उन झुग्गियों में रहने वाले अधिकतर वे हैं जो अपनी श्रमशक्ति बेच कर अपनी आजीविका का साधन जुटाते हैं। मज़दूरी और अन्य श्रमिक कार्यों में लिप्त वहां का रहने वाला मज़दूर इस व्यवस्था का शिकार है, जिसमें उसे रहने के लिए ढंग के आवास के बदले अस्थायी गंदगी के बीच बसे आश्रय को अपना घर मानने को मजबूर किया जाता है।

क्यों खड़ी हो जाती हैं झुग्गियां?

दुनिया के अन्य बड़े शहरों की तरह ही दिल्ली में अधिकतर झुग्गियां शहर के उन इलाकों में बसी, जहाँ उद्योग या रोज़गार के अन्य साधन विकसित हुए।

विकसित होते औद्योगिक शहर में ग्रामीण और आस पास के क्षेत्रों से श्रमिकों का बड़ा हुजूम खिंचा चला आता है। उनके आने से उद्योगों को सस्ते मज़दूर तो मिल जाते हैं, शहर का आधुनिकीकरण होने लगता है, पुरानी सड़कें चौड़ी होने लगती है, नयी रेल लाइन बिछायी जाती है, किंतु श्रमिकों के आवास थोक भाव से गिराये जाते हैं, और शहर में किराया तेजी से बढ़ जाता है।

श्रमिकों को मिलने वाला वेतन इतना नहीं होता कि वे पहले से बने मकानों में किरायेदार के रूप में रह सकें, नये मकान के मालिक की तो बात ही नहीं की जा सकती है। तब इन उद्योगों और उपक्रमों के आस पास ऐसी श्रमिक बस्तियों का उदय होता है, जो अधिकतर सार्वजनिक ज़मीन पर बस जाती है।

उन झुग्गियों को बसने बसाने में उद्योग का फायदा होता है। वहां रहने वाले कम मज़दूरी में काम करने को तैयार रहते हैं। गैर कानूनी तौर पर बनी ये बस्तियां मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने में कई बार मददगार साबित हुई हैं। मज़दूरों को बेदखली का ख़ौफ़ दिखा कर उन्हें नियंत्रित किया जाता रहा है।

दिल्ली की अगर हम बात करें तो यहाँ कारखानों के आस पास झुग्गियों का बड़ा समूह बनता रहा है। रेलवे लाइन के आस पास की जगहों पर भी बड़ी तादाद में झुग्गियां बसीं। उन झुग्गियों में रहने वाले उन्हीं उद्योगों में या उन उद्योगों से जुड़े कार्यों में अस्थायी या अनौपचारिक रूप से काम करते हैं — कूली, रिक्शावाले, खोमचेवाले, चायवाले इत्यादि।

शहर जैसे-जैसे बड़ा होता गया फैक्टरी और उसके आस पास का वह क्षेत्र शहर के बीच हो गया। वे इलाके शहर के केंद्र में आते चले गये और उसके साथ ही उन इलाकों की ज़मीन के भाव भी बढ़ते गये।

रियल एस्टेट (मकान, दुकान बनाना , बेचना) उद्योग बन गया, जिसमें अकूत पूंजी निवेश हुआ। जिन जगहों पर झुग्गी बस्ती थी उन्हें साफ कर उन पर आलीशान अपार्टमेंट, मॉल या आफिस बनाये गये और उनकी ख़रीद बिक्री पर करोड़ों रुपये का मुनाफ़ा कमाया गया। कभी एक “विश्व स्तरीय शहर” बनाने के नाम पर, कभी सौन्दर्यीकरण के नाम पर, कभी सुरक्षा के नाम पर और कभी किसी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के विकास के नाम पर झुग्गियाँ तोड़ने का काम होता आया है।

दिल्ली में तो 1960 के बाद से ही मास्टर प्लान में झुग्गियों को लेकर काफी चर्चा की गयी है। उन्हें हटा कर उनमें रहने वालों को दूसरे जगहों पर बसाने की बात की गयी। अक्सर उन बस्तियों को तोड़ कर उनमें रहने वालों को शहर की सरहदों के आस पास बसा दिया गया। जैसे सन् 2000 के बाद निजामुद्दीन, रोहिणी इत्यादि जगहों पर बसी झुग्गियों को हटा उनमें रहने वाले बाशिन्दों को भलस्वा जैसी दूर और अविकसित जगहों पर 12 से 18 ग़ज़ ज़मीन आबंटित की गयी जहाँ न ही किसी प्रकार की आवाजाही की सुविधा उपलब्ध थी और न ही शहरी विकास विभाग ने वहां नागरिक सुविधाएं जैसे नाली, पीने का पानी इत्यादि की ही कोई व्यवस्था की। लेकिन लोगों को जानवरों की तरह हांक कर वहां पटक दिया।

अब पुराने मज़दूरों की ज़रूरत नहीं रह गयी

नवउदारवादी दौर में पारंपरिक उद्योगों की जगह नये उद्योग जैसे इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, वित्त और अन्य उद्योग (जिन्हें ‘नयी अर्थव्यवस्था’ का नाम दिया गया) का केंद्र बन कर दिल्ली उभरी।

पुराने उद्योग सन् 2000 के बाद से ही दिल्ली से हटा दिये गये थे और इन नयी कॉरपोरेट कंपनियों और ऑफिसों में पुराने मज़दूरों के लिए कोई जगह नहीं है। पूँजीपतियों के लिये झुग्गी बस्तियों में रहने वालों की कोई उपयोगिता नहीं रही। जब उन मज़दूरों की ज़रूरत नहीं तो फिर इन्हें शहर में रहने की भी ज़रूरत नहीं है। हम देख सकते हैं कि किस तरह से सन् 2000 के बाद से ही राजधानी के विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर एक एक करके मज़दूरों को उजाड़ा जा रहा है। इसकी चपेट में न केवल अवैध रूप से बसी झुग्गी बस्तियों को खत्म किया जा रहा है, बल्कि कई वर्षों पहले बसी रिहायशी इलाके जैसे कठपुतली कॉलोनी को भी तोड़ कर उसकी जगह सुंदर अपार्टमेंट बनाने की सरकार ने इजाज़त दे दी।

इसलिये मुम्बई की धारावी मंज़ूर है लेकिन दिल्ली की शक़ूर बस्ती और मायापुरी नहीं। मुम्बई में आज भी मज़दूरों की बड़ी तादाद की ज़रूरत है, गोदी से लेकर मुम्बई के आस पास के उद्योगों के लिए धारावी सस्ते मज़दूर की सप्लाई करती है।

यह मज़दूरों की रिज़र्व सेना का कैम्प है, यह नहीं रहा तो मज़दूर या तो इलाक़ा छोड़ने पर मजबूर हो जायेंगे या फिर अपनी मज़दूरी बढ़ाने की मांग करने लगेंगे जिसे पूंजीपति कभी नहीं होने देंगे।

इसलिये इन मज़दूरों की रिज़र्व सेना को बर्दाश्त करना पूंजीपतियों की मजबूरी है। दिल्ली में भी यही हुआ, जब तक यहां पुराने उद्योग चलते रहे तब तक बस्तियों को बसे रहने दिया गया उनके पुनर्वास की बात होती रही। अब जब रेलवेज़ को स्मार्ट बनाया जा रहा है – निजीकरण, सौन्दर्यीकरण और कई तरह के श्रम प्रक्रियाओं का तकनीकीकरण हो रहा है, तो रेलवे लाइनों के पास की बस्तियों में रहने वाले लोग अतिरिक्त जनसंख्या की श्रेणी में आ गये हैं, जिनकी नियति पहले से ही लिख दी गयी है।

जब हम आज आवास की चर्चा करते हैं तो वह घरों में हो या राजनीतिक गलियारों में, इससे मज़दूर और गरीब गायब हो चुके हैं। आवास की समस्या की बात केवल मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग की समस्या के रूप में की जाती है — गरीबों के लिये आवास की बात बस चुनावों में सुनने को मिलती है, इंदिरा आवास हो या मोदी सरकार की घोषित आवास योजना ये सब कागज़ी फूल की तरह दिखते हैं।

पुनर्वास और आवास : कानूनी नहीं राजनीतिक सवाल

दिल्ली में डी डी ए द्वारा ग़रीब तबक़ों के लिए बनायी गयी योजना भी लाखों रुपये से शुरू होती है। मतलब खुद को मध्यम वर्ग का कहने वाला भी बिना बैंक से लोन लिये इन घरों को नहीं ख़रीद सकता, बिना ढंग की नौकरी वाला क्या करेगा। आवास की समस्या को लेकर वाम आंदोलन ने भी कभी संजीदगी नहीं दिखायी और इसलिये उनका आंदोलन केवल प्रतीकात्मक हो कर रह जाता है।

आज की सरकारी योजनाओं में ग़रीब मेहनतकश पूरी तरह से गायब हो चुका है। सरकारी योजनाएँ भी निजी बिल्डरों के तर्ज पर उसी वर्ग की ओर निहारती हैं जिसके पास पैसा है या जो बैंक कर्ज़ आसानी से ले सकता है। झुग्गियों में रहने वाले इस स्कीम से पहले ही बाहर कर दिये गये हैं।

अवश्य ही सरकारें इन बस्तियों को उजाड़ने का निर्णय खुद नहीं लेना चाहतीं, और इसीलिए पिछले तीन दशकों से यही खेल चल रहा है — संभ्रांत तबकों के वकील याचिका दायर करते हैं, न्यायपालिकाएँ निर्णय सुनाती हैं और सरकारें अपने आप को मजबूर दिखा उन निर्णयों का बेधड़क और निर्मम तौर पर पालन करती हैं।

भारत में इन झुग्गियों को गिराने की प्रक्रिया को और शहरी विकास को हमें केवल विधि व्यवस्था के तौर पर न देख इसके राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझना जरूरी है, तभी हम ऐसी तमाम समस्याओं का सही राजनीतिक अर्थ समझ सकेंगे और उनसे मुक्ति की लाइन ईजाद कर सकेंगे। दरअसल सवाल आवास का है, और यह एक सामाजिक सवाल है।

जब तक कि जिस सामाजिक परिवेश में इसका जन्म होता है उसमें मूल परिवर्तन नहीं किया जाता, यह प्रश्न भिन्न भिन्न रूप में सामने आता रहेगा। यह मुद्दा केवल किसी झुग्गी के टूटने के समय का नहीं है, जो ऐसा समझते हैं इस संजीदा मुद्दे को छोटा कर रहे हैं उसे तुच्छ बना कर पेश कर रहे हैं। मजदूरों के आवास की लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ बगावत है जो मजदूरों के प्रति इस्तेमाल करो और फेंक दो की नीति अपनाती है, उन्हें शहर का हिस्सा नहीं मानती। यह शहर पर शहर बनाने वालों के अधिकार की लड़ाई है।

मज़दूर समन्वय केंद्र

ऑर्डनेन्स फैक्ट्रियों के मज़दूरों का संघर्ष उनका नहीं सबका है!

एक को चोट सभी को चोट है!

ऑर्डनेन्स फैक्ट्रियों के मज़दूरों का संघर्ष उनका नहीं सबका है!

तमाम सरकारें आज तक उदारीकरण अथवा बाज़ारीकरण की प्रक्रिया को लगातार परन्तु सहम-सहम कर चला रही थीं, दो कदम आगे, एक कदम पीछे कर रही थीं। उन सबों ने इतने वर्षों में सरकारी उद्योगों को बेहद कमजोर करने का काम किया था। परंतु इनकी अंत्येष्ठि करने के लिए किसी ठोस इरादे वाली सरकारी शक्ति की आवश्यकता थी, जिसकी पूर्ति मोदी सरकार कर रही है। यह सभी कार्य देशभक्ति और आत्मनिर्भरता के नाम पर हो रहे हैं।

रक्षा उद्योग का बाज़ारीकरण और भारत में सैन्य-औद्योगिक परिसर

मई के महीने में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत कई पैकेजों की घोषणा की थी। रक्षा उद्योग के मामले में भी सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए हैं। ये फ़ैसले सरकार के अनुसार देशहित में हैं क्योंकि इनसे रक्षा उद्योग का विस्तार होगा, हथियारों के मामले में भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और विश्वस्तर पर वह हथियारों का निर्यात करने वाला देश बन जाएगा। 

ध्यान देने योग्य है कि भारत हथियारों का अभी सबसे ज्यादा आयात करने वाले देशों में से एक है। निस्संदेह दक्षिण एशिया में वर्चस्वता के सवाल पर चीन से टक्कर एक प्रमुख वजह है। परन्तु साथ ही सैन्य तकनीकों और उपकरणों का प्रमुख इस्तेमाल देश में अंदरूनी व्यवस्था व्यावहारिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर बनाए रखने के लिए होता है। आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण बढ़ती सामाजिक अस्तव्यस्तता देशी-विदेशी संपत्तिवानों की सुरक्षा और सामान्य नागरिक सर्विलेंस (निगरानी) के लिए तकनीकों और उपकरणों का उत्पादन रक्षा उद्योग की आज प्राथमिकता हो गई है। 

साथ में आज विश्व की कई सरकारें विश्व मंदी के दौर में घरेलू रक्षा उद्योग को अर्थतंत्र के प्रवर्तन के एक मजबूत आधार के रूप में देख रही हैं । इसी को सैन्य-औद्योगिक परिसर (मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स) का विकास कहते हैं — जिसकी आग़ाज़ भारत में काफ़ी साल पहले हो गई थी, परंतु मोदी सरकार ने इस दिशा में दृढ़ता से क़दम उठाए हैं। 2018 की बजट घोषणाओं में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे की स्थापना की बात कही गई थी, जिन पर अभी काम चालू है — उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में। 

ऑर्ड्नन्स फ़ैक्ट्री बोर्ड का निगमीकरण 

वित्त मंत्री ने कोरोना महामारी को अवसर बनाते हुए मई के महीने में इस दिशा में तीन-सूत्री निर्णय सुनाया था। 

पहला, सरकार एक लिस्ट तैयार करेगी और उसको समय-समय पर बढ़ाती रहेगी जिसमें वे हथियार होंगे जिनका आयात नहीं किया जाएगा और जो भारतीय सरकारी और निजी उद्योगों से ही ख़रीदे जाएँगे। 

दूसरा, हालांकि 2001 में ही वाजपेयी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में निजी पूंजी को खुली छूट दे दी थी, और 2018 के बाद विदेशी निवेश को भी खुली छूट मिल गई थी, परंतु अभी तक आटोमेटिक रूट से विदेशी पूंजी निवेश 49 प्रतिशत ही हो सकता था। इस साल सरकार इसको 74 प्रतिशत करने जा रही है।

तीसरा फैसला जो मज़दूरों की दृष्टि से और फौरी तौर पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, वह है ऑर्डनन्स फैक्ट्री बोर्ड का निगमीकरण (कोर्पोरेटाइज़ेशन) यानी उसका सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रम (पीएसयू) में तब्दील किया जाना। निगमीकरण को निजीकरण के प्रारंभिक कदम के रूप में देखा जाता है। और यह बात सही भी है क्योंकि निगमीकरण के बाद निजीकरण करना आसान हो जाता है। 

वैसे भी पीएसयू बनने के बाद पूंजी निवेश के लिए उसके शेयर बेचे जा सकते हैं और जिस तरीके से बाक़ी पीएसयू के साथ सरकार सलूक करती रही है, उससे ओएफबी के पीएसयू बनने के बाद निजीकरण का खतरा अवश्य ही पैदा हो जाता है। तब भी जब तक वो पीएसयू है तब तक सरकार नियंत्रक शेयरहोल्डर होती है। 

निगमीकरण अथवा श्रम का खुला दोहन

हमारा मानना है कि स्वामित्व के सवाल पर इतना जोर निगमीकरण के खास गुणात्मक तत्वों को बहस से गायब कर देता है। फिर वह सरकारी क्षेत्र के बचाव का ही मुद्दा रह जाता है। और उन तत्वों के आधार पर मज़दूर आंदोलन के व्यापकीकरण की संभावना खो जाती है। आइए हम इनमें से कुछ पर चर्चा करें।

स्वायत्त प्रबंधन

किसी भी औद्योगिक निगम के प्रबंधन के तीन स्तम्भ होते हैं — स्वामित्व, बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स और शेयरहोल्डर्स। पीएसयू में स्वामित्व सरकारी ही रहता है — उसके शेयर्स बाजार में बेचे जाएँगे तब भी मौलिक स्वामित्व बना रहेगा। निगमीकरण से औद्योगिक संस्थाओं की स्वायत्तता हो जाती है और वे अपना निर्णय खुद ले सकती हैं — खुद मतलब बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स। इस बोर्ड के संघटन पर ही इन उद्योगों के प्रबंधन की दिशा तय होती है। इस बोर्ड में सरकारी नुमाइंदों के अलावे कई हितधारकों को शामिल किया जा सकता है — सैन्य बलों से और उद्योग से भी। 

बाजार पर निर्भरता 

निगमीकरण के पश्चात जो तथ्य महत्वपूर्ण रूप से बदलता है और जिसका सीधा असर मज़दूरों पर पड़ता है वह उत्पादन और प्रबंधनात्मक निर्णय का अब बाजार और निजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा पर निर्भर होना है। प्रबंधन की स्वायत्तता बाजार-आधारित निर्णयों को लेने में मदद करती है। स्वायत्तता की वजह से सरकार के ऊपर पड़ने वाले सार्वजनिक दबावों का प्रबंधन पर असर कम हो जाता है। 

ऐसी अवस्था में श्रमिकों की गतिविधियाँ, उनका संरक्षण और उनके भत्ते इन निर्णयों पर निर्भर होंगे — अंततोगत्वा उनका भविष्य बहुत हद तक बाजार के उतार चढ़ाव से जुड़ जाएगा। हो सकता है नियमित श्रमिकों की नौकरी पर फौरन कोई असर न हो — वैसे भी नियमित पोस्टों पर नई बहाली लगातार कम होती जा रही है और पुराने श्रमिकों के लिए ज़बरन वीआरएस की स्कीम बाज़ार में पहले से ही मौजूद है। लचीलेपन और दक्षता के नाम पर सस्ते कॉन्ट्रेक्ट और कैज़ुअल श्रमिकों की बहाली निरंतर बढ़ती जाएगी। और साथ में काम का बोझ, काम की अवधि, मशीनीकरण और काम से संबंधित अन्य निर्णयों पर श्रमिकों और उनके संगठनों का प्रभाव कम हो जाएगा। 

दो लाइनों के बीच संघर्ष: यूनियनों का तबकावादी बचाव बनाम वर्गीय एकता और संघर्ष 

सरकारी क्षेत्र के श्रमिकों के लिए यह अवश्य ही आर-पार की लड़ाई है। विडंबना यह है कि एक तरफ पूंजीपति वर्ग और उसकी राजसत्ता ने निगमीकरण और निजीकरण की प्रक्रियाओं को नीतिबद्ध तरीके से चलाया है, परंतु इनके खिलाफ स्थापित यूनियनों ने बचाव का गुहार लगाते हुए इन प्रक्रियाओं को केवल धीरे करने का काम किया है। उनके पास कोई वैकल्पिक योजना अथवा नीति नहीं रही है। 

इस रक्षात्मक तेवर के तहत संघर्ष की योजना के नाम पर केवल कराहते मज़दूरों की भीड़ इकट्ठा की गई है, ताकि सत्ता पक्ष उनकी बद्दुआओं से डर जाएँ। पहले की सरकारों पर थोड़ा तो इनका असर होता था, परंतु वर्तमान सरकार लोकतांत्रिक अनुष्ठानों की कायल नहीं है। पूंजीपति वर्ग की एकता, दृढ़ता और आवश्यकताओं का वह राजनीतिक स्वरूप है।

इसके खिलाफ केवल मज़दूरों की ठोस वर्गीय राजनीतिक एकता ही कारगर हो सकती है। परन्तु यह एकता आर्थिक और वैधानिक तंत्रों द्वारा किए गए मज़दूरों के विभाजन को ठुकरा कर ही कायम हो सकती है। और इसके लिए संघर्ष जितना बाहरी है यानी विभाजनकारी पूंजीवादी नीतियों के खिलाफ है, उससे अधिक अंदरूनी है जो हमारे बीच फैली प्रतिस्पर्धा और भेद के खिलाफ है। विभाजन पर आधारित सांगठनिक स्वरूपों और मांगों की राजनीति के खिलाफ आंतरिक संघर्ष की आवश्यकता है।

ऑर्डनन्स फैक्ट्रीज बोर्ड का निगमीकरण (कोर्परेटाइज़ेशन) उसके अंतर्गत आने वाली इकतालीस फैक्ट्रियों के लगभग 84,000 मज़दूरों का अपने भविष्य को लेकर चिंता करना स्वाभाविक है। पर वही क्यों? शायद 40-50,000 कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों को भी भविष्य की अनिश्चतता सता रही होगी, तभी तो पिछले साल इसी सवाल को लेकर जब तीन बड़े यूनियनों ने हड़ताल की घोषणा की थी तब ये मज़दूर भी उसमे शामिल थे। और फिर  एंसिलरी अथवा सहायक इकाइयों के अधिकांशतः कॉन्ट्रैक्ट/कैज़ुअल कई लाख मज़दूर भी तो हैं। हम उन्हें क्यों न गिने? शायद नेतृत्व को लगता है कि निगमीकरण से इनकी स्थिति में खास बदलाव नहीं आएगा, या फिर इन पर ध्यान देने से नियमित मज़दूरों (जिनको खोने के लिए ज्यादा कुछ है) के नेतृत्व को शायद अपने जनाधार खोने का डर लगता है। 

इस प्रवृत्ति ने (जिसका जन्म प्रबंधकीय और कानूनी नीतियों के तहत हुआ) आज मज़दूर आंदोलन को बेहद कमजोर कर दिया है और राजनीतिक सवालों पर (यानी औद्योगिक और रोज़गार संबंधी सवाल जो कि सभी मज़दूरों के लिए महत्वपूर्ण हैं) उनकी अक्षमता आज साफ दिखती है। यूनियनों के सांगठनिक रूप और नेतृत्व मज़दूरों की गतिविधियों और संबंधों के आधार पर नहीं तय होते, बल्कि राजसत्ता के कानून द्वारा तय होते हैं। इसीलिए उनकी क्षमता राजसत्ता द्वारा निर्धारित होती है, मज़दूरों द्वारा नहीं। यूनियनों की यह अक्षमता आज पूरी तरह से सामने आ गई है।

सही लाइन — मज़दूर नियंत्रण, सामाजीकरण और सैन्य-औद्योगिक परिसर के राजनीतिक सवाल 

हमारा मानना है मज़दूरों के अलग-अलग तबक़ों के मांगों को मांग-सूची में शामिल कर वर्गीय एकता कायम नहीं की जा सकती। इसके आधार पर केवल तात्कालिक राहतें पाई जा सकती हैं। जबतक व्यवस्था पर सवाल नहीं उठेगा, वर्गीय एकता के स्पिरिट अथवा आत्मा की पहचान ही नहीं हो सकती तो उसका निरूपण क्या होगा? इसका अर्थ यह है कि यह आत्मा मज़दूरों के तमाम संघर्षों में मौजूद रहती है परंतु तब तक इस आत्मा को पहचाना नहीं जा सकता जब तक व्यवस्थागत प्रश्नों पर चहलकदमी नहीं होती। 

हमें मज़दूर वर्गीय दृष्टिकोण से निगमीकरण को समझना होगा और उसका विरोध करना होगा, नाकि निजीकरण के भय से और देशहित के नाम पर। पहला तो अधूरा सत्य है और दूसरा आज कोई मायने नहीं रखता क्योंकि सरकार औद्योगिक विस्तार के नाम पर निगमीकरण और निजीकरण के पक्ष में हज़ारों तरह की राष्ट्रवादी दलीलें दे सकती है। कुछ सरकारी नुमाइंदों ने तो बीएसएनएल (BSNL) को ही राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया। राष्ट्रवाद आज मज़दूर संघर्ष की भाषा नहीं हो सकती। नियमित और अनियमित मज़दूरों का भेद बनाए रख कर मज़दूर हित की बात नहीं की जा सकती। फैक्ट्री से लेकर सामाजिक स्तर तक पूंजी की सत्ता को हमें चुनौती देनी होगी। निगमीकरण और निजीकरण के खिलाफ केवल सामाजीकरण (यानी संसाधनों और उद्योगों पर सामूहिक सामाजिक  नियंत्रण) ही विकल्प हो सकता है। विकल्प की बाक़ी सभी फ़रमाइशें पूँजीवादी सत्ता से लेन-देन पर आधारित हैं, जो मज़दूरों के विशेष तबक़ों के लिए कुछ फौरी राहतें पाना चाहती हैं। 

हमारा मानना है कि सामाजीकरण की इस लम्बी लड़ाई में पहला पड़ाव अपने अपने औद्योगिक इकाइयों में मजदूरों के नियंत्रण का है। इसके लिए मज़दूर संगठन की मूल परिभाषा को आज फिर से स्थापित करने की ज़रूरत है जो मज़दूरों से अलग मज़दूरों और पूँजी के बीच समझौता या केवल वार्तालाप का साधन न हो, बल्कि मज़दूरों की राजनीतिक और आर्थिक सत्ता का केंद्र बने। मज़दूरों की कार्यक्षेत्र में आपसी तालमेल का वह निरूपण हो और उसका सामाजिक स्तर पर विकास हो। इतिहास में इसी को फ़ैक्ट्री काउंसिल कहा गया है और सामाजिक स्तर पर इस सांगठनिक स्वरूप के सामान्यीकरण को मज़दूर काउंसिल या सोवियत का नाम दिया गया है। आज जब एक तरफ निगमीकरण और निजीकरण के खिलाफ सरकारी क्षेत्र के नियमित मज़दूर अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं और दूसरी तरफ सरकारी, निजी, संगठित और असंगठित क्षेत्रों के दलदल में अनियमित और अर्ध-बेरोजगारों की विशाल आबादी खट रही है तो यह ज़रूरी हो गया है कि हमारे बीच फूट, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता पर टिकी पूंजी की निश्चित सत्ता को चुनौती मिले। समय आ गया है जब इसके ख़िलाफ़ मज़दूर नियंत्रण की बात शुरू हो, मजदूरों के स्व-सांगठनिक प्रयासों को जगह मिले और मजदूरों के विभाजन पर सवाल उठे। 

ऑर्ड्नन्स फैक्ट्रियों के मज़दूरों की लड़ाई एक तरफ़ अगर फ़ैक्ट्री-स्तर पर उनके अपने हक़ की लड़ाई है, तो दूसरी तरफ़ समाज की प्राथमिकताओं की परिभाषा पर भी लड़ाई है। भारत में सैन्य-औद्योगिक परिसर का विकास यह दिखाता है कि भारत की राजसत्ता पूँजीवाद की वजह से देश में फैलती सामाजिक असुरक्षा का इस्तेमाल सैन्यवाद और मुनाफ़ाख़ोरी के हित में कर रही है। मौलिक सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने के सवाल को दरकिनार कर, असुरक्षा फैला कर, सुरक्षा के व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दे रही है। देशभक्ति, आम असुरक्षा और डर का यह औद्योगिकीकरण है। इसीलिए आज इस प्रक्रिया में किसी तरह की भी रुकावट को बहुत आसानी से चरमपंथी और देशद्रोही क़रार दिया जाता है। दंडविधि और रक्षा उद्योग का बहुत क़रीबी रिश्ता होता है। इसीलिए ऑर्ड्नन्स फ़ैक्ट्री मज़दूरों की लड़ाई केवल उनकी लड़ाई नहीं है, वह पूँजी की सत्ता के ख़िलाफ़ तमाम शोषित और उत्पीड़ित जनता की लड़ाई है जिनकी सामाजिक आवश्यकताएँ केवल सामाजिक तालमेल से पूर्ण हो सकती हैं, नाकि मुनाफ़ाख़ोरी, बाज़ारीकरण और आपसी प्रतिस्पर्धा से। इनकी आर्थिक लड़ाई में मज़दूर वर्ग की व्यापक राजनीति के बीज को हम देख सकते हैं।  

मज़दूरों की भीड़ नहीं वर्गीय एकता!

प्रेषक: श्रमिक संवाद, नागपुर, महाराष्ट्र