निजीकरण के खिलाफ कामगारों के नियंत्रण में सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हो!

9 अगस्त 2020

चलिए अच्छा है, देर आए दुरुस्त आए! कम से कम संगठनों ने अपना मानसिक लौकडाउन तो तोड़ा। जब प्रवासी मज़दूर सड़कों पर सरकारी अमानवीयता के खिलाफ खुली बगावत कर घर वापस जाते दिख रहे थे, भूख, बदहाली और मौत से लड़ रहे थे, तब इन संगठनों का नेतृत्व बयानबाज़ी और तख्तियों पर नारे और माँगें लिख फ़ोटो खिंचवा इंटरनेट पर एक दूसरे को भेज रहा था। और अब जब सरकार ने लौकडाउन हटाया है तो इन्होंने भी पिछले एक महीने से अपनी गतिविधियाँ बढ़ाईं हैं। इससे इतना तो साफ है कि इन संगठनों की गतिविधियाँ सरकारी गतिविधियों के साथ ही जुगलबंदी करती हैं।

ऐसे भी व्यवस्था ने अपने कानूनी प्रावधानों की पोथियों से इनके हाथ-पाँव में बेड़ियां लगा दी है, और इनके संघर्षशील तेवर को कुंद कर दिया है। जब कोर्ट-कचहरी और मांग के दायरे में ही इनकी पूरी शक्ति चली जाती है, तो ये मज़दूरों के दैनिक संघर्षों पर क्या ध्यान दे पाएंगे। ये मज़दूरों की स्वायत्त ताकत को संगठित करने के बजाय, श्रम बाजार में मोल-तोल करने वाली एजेंसियों में तब्दील हो गए हैं। और यही इनके सोचने का दायरा भी हो गया है।

पिछले कई दशकों से देश और विश्वस्तरीय आर्थिक और औद्योगिक बदलाव की वजह से इन संगठनों की नींव ही खिसक रही है। निजीकरण और सरकारी व निजी उद्योगों में ज्यादा-से-ज्यादा कॉन्ट्रैक्ट-कैज़ुअल मज़दूरों की बहाली ने इन यूनियनों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। आज तक ये संगठन अस्थायी मज़दूरों को औद्योगिक आबादी के बाहरी के रूप में ही देखते रहे हैं —पहले हिकारत से देखते थे, अब वे जानते हैं कि इन मज़दूरों के सहयोग के बगैर वे कोई लड़ाई जीत क्या, लड़ भी नहीं सकते। 

आज ये संगठन इन मज़दूरों को जोड़ने को मजबूर हैं मगर सरकारी और कानूनी विभाजन — संगठित/ असंगठित, स्थायी/ अस्थायी इत्यादि —के आधार पर ही। अस्थायी मज़दूरों को बेचारों के ही रूप में देखा जाता है और उनके मुद्दे दान-पुण्य की भाषा मे ही व्यक्त होते हैं। जबकि यह बात सर्वविदित है कि मज़दूरों के पिछले एक दशक के सभी प्रमुख संघर्षों में अस्थायी मज़दूरों की नेतृत्वकारी भूमिका रही है। देशव्यापी आम औद्योगिक हड़तालों के दौरान भी उन्ही इलाकों में जुझारूपन दिखता है जहां अस्थायी मज़दूरों ने अपनी स्वायत्तता प्रदर्शित की है।

किस भारत को बचाना है?

अगस्त महीने में 1942 के “भारत छोड़ो” आंदोलन के तर्ज पर “भारत बचाओ” आंदोलन का जो ऐलान किया गया है, वह इन संगठनों की कमज़ोरी का नमूना है। ये नारा इनकी समझ, रणनीति और राजनीति तीनों को उजागर करता है। आइए इस पर हम थोड़ा ध्यान दें।

एक तरफ़ यह साफ है कि ये संगठन भारत में चल रही राष्ट्रवादी होड़ में ही मज़दूरों की लड़ाई को झोंक देने की कोशिश कर रहे हैं —वे अंधराष्ट्रवाद की भाषा के खिलाफ तथाकथित “सच्चे” राष्ट्रवाद के नाम पर संसदीय पक्ष-विपक्ष के आपसी मुठभेड़ में मज़दूरों को मोहरे बना रहे हैं, और संघर्ष के वर्गीय प्रकृति को कुंद कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, ये नारा उस पूरे इतिहास को भुलाने की कोशिश है जिसका नतीजा आज की आर्थिक दशा, नीतियाँ और राजकीय तानाशाही के रूप में हमारे सामने है। भारत में आज तक जितनी सरकारें रहीं हैं उन्होंने पूँजी की सेवा की है। निजीकरण की प्रक्रिया और “मुक्त” श्रम बाजार कोई पांच-छह साल से मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम नहीं हैं। 

तीसरे, “भारत बचाओ” का नारा किस चीज़ को बचाने की बात कर रहा है? एक देश सामाजिक संबंधों और उनके टकराव में लगातार बनता रहता है। नए भारत के निर्माण की बात न कर हम पुराने संस्थाओं को बचाने की बात कर रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि जो आज भारत की दशा है वह उन्ही संस्थाओं और सामाजिक संबंधों की देन हैं। हम भूल जाते हैं किस प्रकार पुरानी संस्थाएँ और कानून अधिकांश मेहनतकश आबादी को बहिष्कृत रखने का जरिया हैं। यह रक्षात्मक तेवर और कुछ नहीं इन संगठनों का अपने खिसकते जनाधार को बचाने की कोशिश है —अधिकांश मज़दूरों के लिए जिन्हें न क़ानून की न संगठन की सुरक्षा उपलब्ध हैं उनके लिए खोने के लिए सचमुच कुछ नहीं है, परंतु लड़ कर जीतने के लिए सब कुछ है। उन्हें बचाव की घुट्टी पिलाना उनके दैनिक संघर्षों और कठिनाइयों में उनकी जागृत होती चेतना की तौहीन है। मज़दूर वर्ग के विशिष्ट तबक़ों की अपने विशेषाधिकारों को बचाने की कोशिश शायद ग़लत नहीं है, परंतु जब तक इन अधिकारों के सामान्यीकरण और विस्तार का नारा केंद्र में नहीं होगा, तब तक यह बचाव भी संभव नहीं है।

सरकारी क्षेत्र – मज़दूर शोषण का सरकारी तंत्र

निजीकरण के सवाल को उठाने का भी वर्गीय तरीक़ा होता है। नव-उदारवादी नीतियों का अहम हिस्सा है निजीकरण। कल्याणकारी राज्य-व्यवस्था के अंतर्गत संसाधनों और बहुत सारे उद्योगों का सरकारी प्रबंधन जो विकसित हुआ था, उन्हें निजी हाथों में सौंपना ही तो निजीकरण है। सरकारी उद्योगों की समस्याओं को केवल प्रबंधकीय और स्वामित्व की समस्या बता कर निजीकरण को जादुई समाधान के रूप में दिखाया जाता है। 

मगर हमारे नेतागण भी इस तरह के समाधान को उग्र मानकर दूसरे छोर को पकड़े रहते हैं, जबकि मज़दूरों के अधिकांश तबके सरकारीकरण में अपनी समस्याओं का हल नहीं देखते। उन्होंने सरकारी तंत्र में अंतर्निहित नौकरशाही, भ्रष्टाचार और अलगाव को पिछले कई दशकों से देखा है। आम जनता के इसी अलगाव का इस्तेमाल कर राजतंत्र निजीकरण के पक्ष में माहौल तैयार कर रहा है। मज़दूर वर्गीय दृष्टिकोण के तहत सरकारी बनाम निजी का द्वंद्व निरर्थक है, वे दोनों ही पूंजीवादी प्रबंधन हैं और मज़दूरों के श्रम के दोहन पर आधारित हैं।

पिछले तीन दशकों से तमाम सरकारों ने आर्थिक संकट से निकलने के नाम पर दो ही बातों पर ज़ोर दिया है। एक तरफ वे सार्वजनिक अथवा सरकारी अनुष्ठानों और उद्योगों के निजीकरण अथवा बिक्री को अपने सारे कष्टों का निवारण मानती रही हैं। दूसरी तरफ, औद्योगिक और सर्विस सेक्टरों में श्रम प्रक्रिया के अनौपचारीकरण को अर्थात्, साधारण शब्दों में, परमानेंट नौकरियों को रद्द कर असुरक्षित अनियमित कॉन्ट्रैक्ट-कैज़ुअल श्रमिकों की बहाली को वे बढ़ती बेरोज़गारी का इलाज समझती हैं। 

अगर इतिहास में जाएँ तो पता चलता है कि हिंदुस्तान में संसाधनों और बड़े उद्योगों पर सरकारी आधिपत्य यहाँ के बड़े पूँजीपतियों के सिफ़ारिशों पर हुआ था। यहाँ का पूँजीपति वर्ग जानता था कि देश में व्यवस्थित अर्थतंत्र स्थापित करने और औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया सुदृढ़ करने के लिए सरकार को पहल करनी होगी, और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था खोलना होगा। आधुनिक उद्योगों और अर्थतंत्र के लिए जिस तरह की आधारिक संरचना और उत्पादक शक्तियों यानी प्राकृतिक, मानवीय और तकनीकी संसाधनों की ज़रूरत है उनका इंतज़ाम केवल सरकारी हस्तक्षेप के द्वारा हो सकता है।

इसी कारण एक तरफ़ हम सरकारी क्षेत्र में भारी, अत्यावश्यक और एकाधिकारी उद्योगों और उद्यमों को पनपता देखते हैं जिन्होंने देश की आधारिक और उत्पादक संरचनाओं को निर्मित किया। और दूसरी तरफ़, सरकारी नेतृत्व में शिक्षण, अशिक्षण और प्रशिक्षण की प्रणालियाँ स्थापित की गईं जिन्होंने पर्याप्त मात्रा में विभिन्न श्रेणियों के कुशल/अकुशल श्रम का अपार रिज़र्व पैदा किया —जो आज हर प्रकार के श्रम को सस्ते दाम में मुहैया कराता है।

पिछले चार दशकों से पूँजीपतियों की बाज़ार खोलने की माँग यह दिखाती है कि जिस काम के लिए उनकी नज़रों में सरकारी क्षेत्र का विकास हुआ था वह पूरा हो चुका है। इसके साथ साथ यह भी बात सही है कि सार्वजनिक क्षेत्र को भ्रष्ट और नष्ट करने की आतंरिक सरकारी प्रक्रिया और भी पहले शुरू हो चुकी थी। जैसे-जैसे विभिन्न स्तरों की दक्षता रखने वाले मज़दूरों की अधिकता होती गयी, सरकारी उद्यमों ने मज़दूरों को कॉन्ट्रैक्ट और कैज़ुअल के रूप में बहाल करना  शुरू कर दिया। जब न्यायालयों ने इस प्रथा पर प्रश्न उठाया तो सरकार ने अधिनियम लाकर कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों की बहाली करने पर  निर्णय लेने का अधिकार अपने ऊपर ले लिया।

बाद के दशकों में यह प्रथा इतनी बढ़ती चली गयी कि इसे विकास का लाज़िमी नतीजा मान लिया गया। यहाँ तक कि मज़दूरों के राष्ट्रीय संगठनों के नेतृत्व में बनी सार्वजनिक क्षेत्र की मान्यता प्राप्त यूनियनों ने आँखें मूंद कर केवल अपने पुराने जनाधार को बचाने की लड़ाई तक अपने आप को सीमित कर लिया, जबकि सरकारी क्षेत्र में अस्थायी मज़दूरों का शोषण बेतहाशा बढ़ता चला गया। आज भारत में श्रमिकों के शोषण का सबसे व्यापक व्यवस्थित नव-उदारवादी मॉडल सरकारी क्षेत्र है। ऐसे में यह स्वभाविक ही है कि आज जब निजीकरण की प्रक्रिया को रोकने की अंतिम लड़ाई चल रही है, तो दूर-दूर तक इसके लिए कोई व्यापक जन आंदोलन की तात्कालिक संभावना नहीं दिखती है।

निजीकरण के खिलाफ मजदूर नियंत्रण में सार्वजनिक क्षेत्र को व्यापक करो!

सार्वजनिक क्षेत्र का बचाव राष्ट्रवाद के आधार पर, विदेशियों और बड़े पूँजीपतियों का ख़तरा दिखा कर और सरकारी बनाम निजी के आधार पर नहीं किया जा सकता। अंध-राष्ट्रवाद के ज़माने में किसी भी तरह का राष्ट्रवाद उसके अंधे स्वरूप को ही बढ़ाएगा। देशी-विदेशी और बड़े-छोटे के झाँसे में मज़दूर को फँसाना ठीक नहीं है क्योंकि इसके नाम पर तमाम प्रागाधुनिक और निकृष्ट कोटि के श्रम-व्यवहारों का समर्थन किया जाता है। पूँजी का मौलिक चरित्र इन सब पहचानों से ऊपर सामाजिक और श्रम संबंधों में देखने की ज़रूरत है। इसीलिए वर्गीय आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र का बचाव और निजीकरण का विरोध करने की ज़रूरत है। तमाम उद्योगों के मज़दूर नियंत्रण में सार्वजनीकरण के लिए संघर्ष में ही इस क्षेत्र का बचाव संभव है।

परंतु इसके लिए ज़रूरी है कि व्यवस्था ने जो कानून और राजनीतिक चश्मा हमें पहनाया है, जिसके कारण हमें मज़दूर वर्ग व्यक्तिकृत या अलग अलग तबक़ों में विभाजित दिखता है, उसे हमें उतार फेंकना होगा। मज़दूर वर्ग वह निषेधात्मक शक्ति है जो व्यक्तिकृत मज़दूरों में नहीं, उनके अलग-अलग तबक़ों में नहीं बल्कि उनके सामूहिक संबंध और सामंजस्य में और पूंजी के साथ उनके द्वंद्व में पैदा होता और दिखता है। इसलिए मुद्दों की गिनती और मांगपत्र में जोड़-घटाव से वर्गीय एकता नहीं स्थापित होती, बल्कि श्रमिकों के संघर्ष में वर्ग क्रन्तिकारी प्रवृत्ति के बतौर मौजूद रहता है। संघर्ष के सांगठनिक व्यवहार को उस प्रवृत्ति के अनुरूप होना होगा ताकि वह मूर्तिमान हो सके।

अब समय आ चुका है जब मज़दूर आंदोलन के अंदर से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकल्प की बातचीत शुरू हो। जरूरत है मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में समाजिकृत स्वामित्व और प्रबंधन की लड़ाई को सामने लाया जाए और दिखाया जाए कि इसी में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकटों का स्थायी समाधान निहित है। आंदोलनों के चाहे कुछ भी तात्कालिक मुद्दे हों, उन्हें समाज परिवर्तन की लड़ाई से जोड़ना होगा, इसी परिवर्तनगामी दिशा में वर्गीय नेतृत्व पैदा हो सकता है। वर्गीय राजनीति संघर्ष और परिवर्तन में निहित है, न कि बने बनाए संस्थाओं और संगठनों के आपसी और अंदरूनी प्रतिस्पर्धात्मक प्रतिनिधित्व में। मज़दूरों के विभिन्न तबक़ों को बचाव और गुहार लगाने की राजनीति से आगे निकलना होगा, नहीं तो वर्गीय प्रवृत्ति को दक्षिणपंथ और पूँजी का राजतंत्र कुंद कर व्यक्तिकृत मज़दूरों की उत्कंठाओं को अपने आप को सशक्त करने के लिए संगठित करेगा। इसी वर्गीय प्रवृत्ति की पहचान और उसके आधार पर सांगठनिक और आन्दोलनकारी विन्यास शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ श्रमिक और मानव मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करेंगे।

प्रकाशक: श्रमिक संवाद, कामगार कालोनी, नागपुर, महाराष्ट्र